हसद (ईर्ष्या/डाह) और द्वेष से सुरक्षा के क़ुरआनी उपाय
संदर्भ एवं धार्मिक महत्व
हसद (ईर्ष्या) एक खतरनाक आत्मिक बीमारी है जिसमें कोई व्यक्ति दूसरे की नेमत छिन जाने की चाह रखता है। सूरह अल-फ़लक़ में अल्लाह तआला ने साफ़ हुक्म दिया है: 'और हसद करने वाले की बुराई से जब वह हसद करे' (113:5)। यह क़ुरआनी आयतें हसद के बुरे प्रभाव से हिफ़ाज़त की बेहतरीन शिफ़ा हैं।
📖पढ़ने योग्य आयात एवं हदीस
3 आयात / हदीसकुल अऊज़ु बिरब्बिल फलक़। मिन शर्रि मा ख़लक़। व मिन शर्रि ग़ासिक़िन इज़ा वक़ब। व मिन शर्रिन-नफ़्फ़ासाति फ़िल उक़द। व मिन शर्रि हासिदिन इज़ा हसद।
कहो, 'मैं पनाह मांगता हूँ सुबह के रब की, हर उस चीज़ की बुराई से जो उसने पैदा की, और अंधेरी रात की बुराई से जब वह छा जाए, और गांठों में फूंकने वाली जादूगरनियों की बुराई से, और ईर्ष्या करने वाले की बुराई से जब वह ईर्ष्या करे।'
स्रोत: मौलाना फ़तेह मुहम्मद
कुल अऊज़ु बिरब्बिन-नास। मलिकिन-नास। इलाहिन-नास। मिन शर्रिल वसवासिल खन्नास। अल्लज़ी युवसविसु फ़ी सुदूरिन-नास। मिनल जिन्नति वन-नास।
कहो, 'मैं पनाह मांगता हूँ इंसानों के रब की, इंसानों के बादशाह की, इंसानों के सच्चे माबूद की—उस छुपकर फुसफुसाने वाले की बुराई से जो इंसानों के सीनों में वसवसा डालता है, चाहे वह जिन्नों में से हो या इंसानों में से।'
स्रोत: मौलाना फ़तेह मुहम्मद
अल-'ऐनु हक़्क़ुंव-व लौ काना शैयुन साबक़ल-क़दर सबक़तहुल-'ऐनु, व इज़ा-स्तुग़सिल्तुम फ़ग़सिलू।
अल्लाह के रसूल ﷺ ने फरमाया: 'बुरी नज़र (बदनज़र) सच है। यदि कोई चीज़ तक़दीर से आगे बढ़ सकती, तो वह बुरी नज़र ही होती। और जब तुमसे (पीड़ित के लिए) ग़ुस्ल करने को कहा जाए, तो ग़ुस्ल कर दो।'
स्रोत: सहीह मुस्लिम
🌿अमल करने का सुन्नत तरीक़ा
सुबह-शाम और ज़रूरत के समय सूरह अल-फ़लक़ और सूरह अन-नास कसरत से पढ़ें। जब भी किसी की कोई अच्छी चीज़ या नेमत देखें तो 'माशाअल्लाह तबारकल्लाह' कहें और उसके लिए बरकत की दुआ करें।
महत्वपूर्ण सुरक्षा एवं शरीअत निर्देश
रुक़या अल्लाह से हिफ़ाज़त और शिफ़ा मांगने का ज़रिया है; यह डॉक्टरी इलाज का विकल्प नहीं है। बीमारी में डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें। तावीज़ न पहनें और न ही किसी ज्योतिषी या जादूगर के पास जाएं।
संबंधित अन्य विषय
बुरी नज़र (बदनज़र) उतारने का मसनून ग़ुस्ल व वुज़ू का तरीक़ा
अल्लाह के रसूल ﷺ ने फरमाया: 'बुरी नज़र सच है। यदि कोई चीज़ तक़दीर से आगे बढ़ सकती, तो वह बुरी नज़र ही होती। और जब तुमसे ग़ुस्ल करने को कहा जाए, तो ग़ुस्ल कर दो।' (सहीह मुस्लिम 2188)। यदि नज़र लगाने वाले का पता हो, तो उससे वुज़ू करवाकर उस पानी को पीड़ित पर डालना सहीह सुन्नत से साबित रुक़िया व शिफ़ा है।
बुरी नज़र (ऐन) और ईर्ष्या के लिए सहीह रुक़या
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: 'नज़र का लगना सच है' (मुस्लिम २१८८)। किसी सुंदर चीज़ को देखकर ईर्ष्या या आश्चर्य से नज़र लग सकती है। जिब्रील (अ.) ने स्वयं नबी ﷺ पर नज़र का रुक़या किया था।